बदायूं: एक मुहावरा है, जाको राखे साईया, मार सके न कोए। ऐसा ही मामला बदायूं के कदरचोक थाना क्षेत्र के कस्बा खितौलिया में गुरुवार को देखने को मिला. यहां कलियुगी मां ने अपने पेट से दुनिया में लाए गए नवजात कन्या को पत्थर दिल के लोगों को सौंप दिया। जिसने बच्चे को खेत में दफन कर दिया, लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था।
एक मुहावरा है, जाको राखे साईया, मार सके न कोए। ऐसा ही मामला बदायूं के कदरचोक थाना क्षेत्र के कस्बा खितौलिया में गुरुवार को देखने को मिला. यहां कलियुगी मां ने अपने पेट से दुनिया में लाए गए नवजात कन्या को पत्थर दिल के लोगों को सौंप दिया। जिसने बच्चे को खेत में दफन कर दिया, लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था।
जब खेत में शौच के लिए गई बच्ची की आवाज सुनी तो वह दंग रह गई। महिला ने मिट्टी में ढके बच्चे को बाहर निकाला और छाती से लगा कर घर वापस आ गई। कस्बे में पहुंचे एसओ वेदपाल सिंह ने नवजात को सीने से लगा लिया। इसके बाद एसओ ने रचना का अवलोकन किया और शिशु को यंगस्टर लाइन समूह को सौंप दिया। टीम ने महिला क्षेत्र के मेडिकल क्लिनिक के एनआईसीयू में बच्चे को भर्ती कराया है। यहां वह स्वस्थ है। फिलहाल पुलिस दोषियों की तलाश कर रही है।
कादरचौक थाना मुख्यालय के एसओ वेदपाल सिंह ने बताया कि खितोलिया कस्बे के अतिथि महाराज सिंह बालक कर्ण सिंह ने पुलिस को सूचना दी थी कि उनके कस्बे में एक जीवित नवजात युवती खेत में दफन हुई मिली है. सूचना मिलने पर एसओ पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे। जहां नवजात गांव निवासी सुखदेवी पत्नी प्रताप के घर मौजूद मिली। पुलिस की जानकारी करने पर सुखदेवी ने बताया कि सुबह वह खेतीहार में शौच को गयी थी। इसी बीच उन्होंने युवती के रोने की आवाज सुनी। इस दौरान जब उन्होंने शिशु के हाथ-पैरों को मिट्टी में ढका देखा तो वह शिशु को मिट्टी से निकाल कर घर ले आया। यहां उन्होंने शिशु को नहलाया और नए कपड़े पहनाए। एसओ ने शिशु को चाइल्डलाइन के डिस्टिंक्ट फैसिलिटेटर कमल शर्मा के हवाले कर दिया है।
जब स्थानीय लोगों को पता चला कि खेत में एक नवजात कन्या है, तो वे सीधे सुखदेवी के घर की ओर भागने लगे। सुखदेवी के घर पर लोगों की भीड़ जमा हो गई। जिसने एक तरफ कलियुगी की मां की निंदा की और दूसरी तरफ से शिशु पर वार किया। इनमें से बड़ी संख्या में व्यक्तियों ने शिशु को लेने की अपनी लालसा का संचार करना शुरू कर दिया। पुलिस ने जब बच्ची को यंगस्टर लाइन को सौंपा तो सुखदेवी की भी आंखों से आंसू छलक पड़े।