एक दिन संसार से हम सभी को जाना है, सबको मृत्यु का ग्रास बनना है, मरना है. जिसने यह जान लिया उसके सारे झगड़े, दुख, चिंताएं खत्म हो जाती है.

प्रस्तुति: डॉ. एम एल परिहार, जयपुर

तथागत बुद्ध कहते हैं - "जब संसार से एक दिन जाना ही है तो घर परिवार, समाज से लेकर देशों तक ये झगड़े फसाद, क्रोध, मोह, लोभ, लालच, नफरत क्यों है ?
"हमें कलह नहीं करना चाहिए. कभी भी यह मत सोचो कि हम अमर रहेंगे, कभी भी नहीं मरेंगे. सोचना ही है तो अपनी मुक्ति की सोचो, उस अमृतपद 'निर्वाण' को प्राप्त करो. जो परम सुख, परम-आनंद और असीम शांति देता है. उसी पर चलो, उसी पर अपने ज्ञान की आंखें लगाओ, ध्यान लगाओ.
"तुम विचार करो कि हर पल संसार में परिवर्तन हो रहा है. हर पल हम भी नष्ट हो रहे हैं, मर रहे हैं. अतः अपने मार्ग को जानो, ध्यान की एकाग्रता और सजगता से तुम यह जान लोगे तो सारे दुख, कलह दूर हो जाएंगे
"जो अज्ञानी, अनाड़ी लोग इस बात का ख्याल नहीं करते कि वे इस संसार में नहीं रहेंगे, उनके कलह कभी भी कम नहीं होते. और जो सजग होकर ख्याल करते हैं कि संसार से एक दिन सबको जाना है, उनके सारे कलह शांत हो जाते हैं.
••एक बार कौशांबी के विहार में भिक्षुसंघ में किसी विषय को लेकर आपस में गुटबाजी हो गई. वे विवाद कलह करने लगे. वर्षावास का समय था. भगवान ने उन्हें उस समय समझाना उचित नहीं समझा और भिक्षुओं को छोड़कर एकांत वन में ध्यान करने चले गए.
जब कौशांबी के लोगों को यह मालूम हुआ तो उन्होंने भिक्षुओं को भिक्षा देना बंद कर दिया. भिक्षु बेहाल हो गए. अपनी गलती का एहसास करने लगे.
अपनी भूल की माफी मांगने के लिए सभी भिक्षु तथागत के पास गए. नमन किया, वंदना की और महाकारुणिक के चरणों में गिर पड़े. तथागत के मन में प्रेम, करुणा, मैत्री की निर्मल धारा हमेशा बहती रहती है.
उस समय भगवान ने भिक्षुओं को यह गाथा कही-
परे च न विजानन्ति, मयमेत्थ यमामसे।
ये च तत्थ विजानन्ति, ततो सम्मति मेधगा।।
सबका मंगल हो. सभी प्राणी सुखी हो