कविता - वक्त की नजाकत

वो आज फिर अपने दाम
बढ़ाकर घटाने लगे हैं।
जिनसे मिलने में हमें, जमाने लगे।
कल तक उनके दर पर खड़े थे।
हम,कतार लगाकर।
वक्त की नजाकत तो देखिए ,
साहब ! अब वो हमारे घर के
दरवाजे खटखटाने लगे है।
कल तक जिनके लिए गैर थे।
हम,वो आज फिर से
हमें अपना बताने लगे है।
हकीकत से कोसों दूर रहे,
जो एक अरसे तक,वो आज फिर से
हमें ही जमीनी हकीकत बताने लगे है।
बनकर हितेशी कल तक जिन्हें
सपने कोई और दिखाता रहा।
वो आज फिर वही
झूठे सपने हमें दिखाने लगे ।
वो आज फिर अपने दाम
बढ़ाकर घटाने लगे है।