आखिर दशहरा मेला कब लगेगा , इंतजार में हर कोई

संवाददाता शिवकुमार शर्मा
कोटा |
एतिहासिक विरासत धुआं धुआं राजनेताओं और राज परिवार की आश्चर्यजनक चुप्पी!

कोटा में रावण दहन सिर्फ औपचारिकता निभाई

एतिहासिक दशहरा मेला अपने 125 वर्षीय जश्न की खुशियां मनाने से पहले ही लगभग काल के गाल में समा गया । हर बच्चे युवा पुरुष या महिला हर कोई चाहता है कि मेला लगे और उसका आनंद उठाएं किंतु यह दूर की कौड़ी ही लग रहा है।

विगत वर्ष कोरोना की अवधि एवं नए दशहरा मैदान बनने के साथ ही इसके पतन की नींव तो कथित प्रगति मैदान के नाम पर तैयार हुए नए परिसर की आधारशिला के साथ ही रख दी गई थी.जब राजनीति के व्यापारियों को ग्रामीण संस्कृति के प्रतीक, पशु आदि को ग्रामीणों द्वारा बेचने के लिए मेले में लाना चुभ रहा था. ।
इन्होंने सबसे पहले मेले में लाए जाने पशुओं को उनके पालकों के साथ शहर से 10-15 किलोमीटर दूर खदेड़ दिया. जहां उन्हें पीने के पानी तक के लिए तरसना पड गया. कई पशु व्यापारियों की जेब तक कटी है. ।पशु व्यापारी क्या.. मेले से जुड़े हर व्यापारी को षडयंत्र पूर्वक हतोत्साहित किया गया. यह सब किया, एक साँस्कृतिक, एतिहासिक विरासत को खत्म करने के लिए।
कथित प्रगति मैदान के नाम पर चार दीवारी में बंद परिसर है, जिसमें प्रतीकात्मक रावण दहन हुआ किंतु वह भी आम जनता देखने को उत्सुक थी लेकिन नहीं जाने कुछ लोगों की उपस्थिति में रावण दहन कर सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखा लेकिन शहर वासियों हाडोती वासी ही नहीं देश व विदेश से आने वालों को भी इस वर्ष भी दशहरा मेला नहीं भरने का मलाल है।

जब सब कुछ खुला तो दशहरा मेले पर ही पाबंदी क्यों

जब स्कूल खुल गए व्यापारिक प्रतिष्ठान खुल गए धार्मिक संस्थान खुल गए सिनेमा हॉल खुल गए जब सब कुछ खुला खुला हो गया ऐसे में सांस्कृतिक विरासत को सजाने के लिए तथा लोगों को रोजगार के लिए लगने वाले दशहरे मेले पर ही पाबंदी क्यों यह हर व्यक्ति के जहन में बात उठ रही है

प्रशासन एवं राजनेताओं को आवाज उठानी चाहिए

न्यू कोटा इंटरनेशनल सोसायटी की अध्यक्ष श्रीमती अंजू शर्मा ने कहा कि प्रशासन को भी 125 वर्ष दशहरे मेले को भरने के लिए एक प्रस्ताव राज्य सरकार को भी अतिरिक्त रूप से भेजना चाहिए की सांस्कृतिक विरासत को संजोने वाला दशहरा मेला हाडोती ही नहीं देश विदेश के लिए व्यापारिक केंद्र है जिसका लाभ कोटा वासियों को वहां यहां के व्यापारियों को तथा आमजन को सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए किया जाना चाहिए मेला भले 15 दिन का नहीं लगाएं, किंतु 5 दिन का मेला लगा कर इस विरासत को बचाने का प्रयास किया जाना चाहिए। वही कोटा के राजनेताओं को भी इसके लिए अपनी आवाज बुलंद करते हुए राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार पर दबाव बनाकर इसकी स्वीकृति लेकर दशहरा मेले को भरवाने का प्रयास किए जाने चाहिए अभी भी समय है कि हम पांच साथ दिन का मेला तो लगवा ही सकते हैं।

मेला हमारी सांस्कृतिक विरासत

कोटा का दशहरा मेला सांस्कृतिक विरासत है ऐसे में इसको निरंतर जारी रखने के लिए भागीरथी प्रयास किए जाने की आवश्यकता है यह प्रशासनिक स्तर पर राजनीतिक स्तर पर एक माहौल बनाकर इसके लिए आवाज उठाने की दरकरार है।

रूआँसे से हैं दुकानदार

कोटा दशहरे मेले में लगने वाली दुकानों से दुकानदार जहां खुश रहते थे तथा अपनी आजीविका के लिए दशहरे मेले का इंतजार करते थे वह इस साल भी रूआँसे से हैं उनका कहना है कि वह हर साल अपनी आंखों में अपने परिवार के अपने व्यापार के लिए दशहरे मेले की आस करते थे किंतु विगत वर्ष भी नहीं भरा तथा इस वर्ष भी नहीं भर रहा ऐसे में उनके परिवार को भी पेट पालने के लिए संकट का सामना करना पड़ेगा। दशहरे मेले में कमाई हो जाती थी उससे परिवार का लालन पोषण पालन आराम से हो जाता था।