सृजन मनुष्य को जीवित रखने का सबसे सशक्त औजार है - डॉ बलराम अग्रवाल

सृजन मनुष्य को जीवित रखने का सबसे सशक्त औजार है - डॉ बलराम अग्रवाल
(माधव नागदा को आचार्य लक्ष्मीकांत जोशी साहित्य सम्मान )

रिपोर्टर -गौतम के गट्स जोधपुर

जोधपुर, 29 मई। सृजना कला, संस्कृति, शिक्षा विमर्श मंच और जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर की संयुक्त मेजबानी में अखिल राजस्थान स्तरीय आचार्य लक्ष्मीकांत जोशी साहित्य (लघुकथा) सम्मान समारोह और लोकार्पण रविवार को जोधपुर में आयोजित किया गया।

इस साल का आचार्य लक्ष्मीकांत जोशी साहित्य सम्मान विख्यात कथाकार और आलोचक माधव नागदा को उनकी कृति "माटी की महक" के लिए प्रदान किया गया। उन्हें सम्मान के रूप में श्रीफल, 21 हजार रुपए राशि का चेक और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दिल्ली के ख्यात साहित्यकार डॉ बलराम अग्रवाल और अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम प्रकाश व्यास थे।

कार्यक्रम के आरंभ में अयोध्याप्रसाद गौड़ ने स्व.आचार्य लक्ष्मीकांत जोशी के बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचय दिया । सृजना के सचिव और कार्यक्रम के संचालक डॉ हरीदास व्यास ने इस आयोजन का परिचय देते हुए बताया कि आचार्य जोशी के शिक्षा और साहित्य क्षेत्र में योगदान को चिरस्थाई रखने के उद्देश्य से यह सम्मान प्रतिवर्ष अखिल राजस्थान स्तर पर अलग-अलग विधाओं पर प्रविष्टियाँ आमंत्रित कर प्रतियोगिता के माध्यम सर्वश्रेष्ठ कृति के रचनाकार को समारोह आयोजित कर प्रदान किया जाता है।

इस अवसर पर तीन पुस्तकों का विमोचन भी किया गया इनमें मुरलीधर वैष्णव की पुस्तक 'धरा पर इंद्रधनुष", हरीदास व्यास की पुस्तक "कहानी है कि खत्म ही नहीं होती" और बसंती पवार की पुस्तक 'नाक का सवाल' के अंग्रेजी अनुवाद " फ़ॉर द सेक ऑफ नोज़" शामिल थीं।

माधव नागदा ने अपने उद्बोधन में लघुकथा से जुड़ी उनकी सृजन यात्रा को साझा करते हुए कहा कि साहित्यकार को अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में पारस्परिक सद्भाव जगाना चाहिए। देश में बढ़ रही असहिष्णुता का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस स्थिति के जिम्मेदार पड़ोसी देश नहीं बल्कि हम सभी देशवासी हैं। आज के समय में लेखक का दायित्व समाज को जागरूक करने की दृष्टि से और ज्यादा हो महत्त्वपूर्ण जाता है। उन्होंने अपनी चुनिंदा लघु कथाओं का वाचन भी किया।

मुख्य अतिथि के रूप में अपने संबोधन में डॉ बलराम अग्रवाल ने 'लघुकथा- सर्जन और चुनौतियां' विषय पर बोलते हुए कहा कि सृजन मनुष्य को जीवित रखने का औजार है। लघुकथा सृजन की वह विधा है, जिसमें लेखक का मौन भी मुखर होता है। लघुकथा विस्तृत ब्यौरों से मुक्ति दिलाते हुए बिंब व प्रतीकों के सहारे अपनी बात कहती है। यह एक ऐसा शिल्प है जहां एक लोकोक्ति पूरे पैराग्राफ की जगह ले सकती है। लघुकथा के समक्ष चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज का रचनाकार अपनी रचना से संवाद नहीं करता। डिजिटल सुविधाओं ने उसे अपनी रचना से दूर कर दिया है। लेखक को विचार, अभिव्यक्ति और कर्मशीलता के स्तर पर चुनौती का सामना करना पड़ता है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रेम प्रकाश व्यास ने कहा कि सृजन समाज का दर्पण नहीं बल्कि एक प्रिज़्म है जिस से निकलकर विभिन्न विचारों, सम्वेदनाओं और अनुभूतियों के विभिन्न रंगो का प्रकाश हमें प्राप्त होता है।

स्वागत उद्बोधन सृजना अध्यक्ष सुषमा चौहान ने दिया। कार्यक्रम के अंत में हरि प्रकाश राठी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
कार्यक्रम प्रभारी प्रगति गुप्ता ने बताया कि समारोह में शीन काफ़ निज़ाम, दीप्ति कुलश्रेष्ठ, कैलाश कबीर, मीठेश निर्मोही, राकेश मूथा, हबीब कैफी , प्रो. कौशलनाथ उपाध्याय, शीन में हनीफ, नफ़ासत, डॉ पद्मजा शर्मा, डॉ चांदकौर जोशी, उषा माहेश्वरी, विमल मेहरा, श्याम गुप्त , इश्राकुल माहिर, डॉ नीना छिब्बर , ऋचा शरद अग्रवाल सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित रहे।